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खनन

 

 

नेयवेली लिग्नाइट खानों की प्रमुख विशेषताएँ

क) लिग्नाइट तह के नीचे भूजल जलभृत की उपस्थिति :
संपूर्ण लिग्नाइट परत के नीचे भूजल का एक विशाल जलाशय है, जो 6 से 8 किमी प्रति वर्ग सेमी ऊपर की ओर दबाव डालता है। खनन से पूर्व पानी का यह दबाव यदि कम न किया जाए, तो यह लिग्नाइट परत को तोड़ देगा और खानों में पानी भर जाएगा। इस समस्या का समाधान पूर्वनिर्धारित स्थानों पर स्थित बोरवेल के माध्यम से दिन-रात लगातार पानी बाहर निकालकर और लिग्नाइट खनन क्षेत्र में पानी का दबाव कम करके किया गया। पिछले कुछ वर्षों में, सतत अध्ययन एवं नई विधियों के कार्यान्वयन द्वारा बाहर निकाले जाने वाले पानी की मात्रा 50,000 जी.पी.एम. से घटकर 32,000 जी.पी.एम. हो गई है (एक टन लिग्नाइट खनन हेतु लगभग 13 टन पानी बाहर निकालना पड़ता है)। भूजल के उचित प्रबंधन के लिए निरीक्षण वेल्स के माध्यम से पानी के स्तर की लगातार देख रेख की जा रही है।

ख) लिग्नाइट के लिए ओवर्बर्डन का उच्च अनुपात :
नेयवेली के खान-। में लिग्नाइट के ऊपर ओवर्बर्डन का अनुपात 5.5 से 5 एम3: 1 टन है। इसके कारण बहुत बड़ी मात्रा में ओवर्बर्डन हटाने की आवश्यकता पड़ती है (1 टन लिग्नाइट खनन हेतु 11 टन ओवर्बर्डन हटाना पड़ता है)। अगली तैयारी के बाद वृहत पैमाने के ओवर्बर्डन की हैंडलिंग हेतु उच्च क्षमता के एक्स्कवेटर उपयोग किए जाते हैं।

ग) कठोर ओवर्बर्डन परत :
उच्च समेकित ओवर्बर्डन मुख्य रूप से कडलूर बलुआ पत्थर के बने हैं और काफी कठोर एवं अपघर्षी हैं। इस समस्या का समाधान बकेट व्हील टीथ में उचित सुधार करके तथा सुव्यवस्थित ड्रिलिंग एवं ब्लास्टिंग प्रोग्राम के निर्माण द्वारा किया गया।


घ) चक्रवाती क्षेत्र :
यह खान मुख्य रूप से मानसूनी एवं चक्रवाती क्षेत्र में स्थित है। हर वर्ष औसतन 1200 मि.मी. वर्षा होती है एवं 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक की गति से हवा चलती है। हर वर्ष, मानसून हेतु अग्रिम रूप में एक विस्तृत कार्रवाई योजना तैयार की जाती है।


खान-I पर्यावरण मंजूरी

खान-I ए पर्यावरण मंजूरी

 

खान - I विस्तार सहित:

अगस्त 1961 में पहली बार यहाँ लिग्नाइट की परत का पता चला और मई 1962 में लिग्नाइट का नियमित खनन आरंभ हुआ। नेयवेली खान-। में देश में पहली बार बकेट व्हील एक्स्कवेटर, कन्वेयर और स्प्रेडर के उपयोग से ओपन कास्ट माइनिंग के लिए जर्मन एक्स्कवेशन तकनीक का उपयोग किया गया। इस खान की क्षमता 6.5 मिलियन टन थी, जिससे ताप गृह-। की ईंधन आवश्यकता पूरी होती थी। खान-। विस्तार योजना के अंतर्गत मार्च 2003 से यह क्षमता बढ़कर 10.5 मिलियन टन लिग्नाइट प्रति वर्ष हो गई, और वर्तमान में इससे ता.वि.गृ-। एवं ता.वि.गृ-। विस्तार के लिए विद्युत उत्पादन हेतु ईंधन आवश्यकता की पूर्ति होती है।

   
   
 

खान - II विस्तार सहित:

भारत सरकार ने फरवरी 1978 में 4.7 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता की दूसरी लिग्नाइट खान को मंजूरी दी तथा फरवरी 1983 में उस खान की क्षमता 4.7 मिलियन टन लिग्नाइट प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 10.5 मिलियन टन करना स्वीकृत किया। खान-। के विपरीत, खान-।। को आरंभिक चरण में चिपचिपे मटियार मिट्टी की खुदाई में समस्याओं का सामना करना पड़ा। यहाँ खनन की विधि और उपयोग किए जाने वाले उपकरण खान-। जैसे ही हैं। लिग्नाइट की परत खान-। जैसी और इसके समकक्ष ही है। सितंबर 1984 में पहली बार खान-।। में लिग्नाइट की परत का पता चला और मार्च 1985 में लिग्नाइट खनन आरंभ हुआ। भारत सरकार ने अक्टूबर 2004 में 2295.93 करोड़ रुपए की लागत पर 10.5 मिलियन टन प्रति वर्ष से 15.0 मिलियन टन प्रति वर्ष लिग्नाइट तक खान-।। के विस्तार को मंजूरी दी। 12 मार्च 2010 को खान-।। विस्तार परियोजना पूर्ण हुई। खान-।। से प्राप्त लिग्नाइट से ताप विद्युत गृह-।। और निर्माणाधीन ताप विद्युत गृह-।। विस्तार की ईंधन आवश्यकता की पूर्ति होती है।

   
 
   

खान I ए:

भारत सरकार ने फरवरी 1998 में 1032.81 करोड़ रुपए की लागत पर 3 मिलियन टन लिग्नाइट प्रति वर्ष की खान-।ए परियोजना को मंजूरी दी। यह परियोजना मुख्य रूप से मेसर्स एस.टी.-सी.एम.एस के विद्युत संयंत्र की लिग्नाइट आवश्यकता की पूर्ति‍ करने और साथ ही शेष बचे लिग्नाइट का उपयोग एन.एल.सी. द्वारा श्रेष्ठ वाणिज्यिक लाभ प्राप्त करने हेतु है। यह परियोजना नियत समय एवं लागत पर 30 मार्च 2003 को पूर्ण हो गई।

   
 
   

बरसिंहसर खान :

भारत सरकार ने दिसंबर 2004 में 254.60 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत पर 2.1 मिलियन टन प्रति वर्ष लिग्नाइट क्षमता वाले बरसिंहसर खान के कार्यान्वयन को मंजूरी दी है। ओवरबर्डन तथा लिग्नाइट उत्पादन दोनों बाहरी स्रोत को ठेके पर दिए गए हैं। 23 नवंबर 2009 को लिग्नाइट खनन का आरंभ हुआ तथा 31 जनवरी 2010 को निर्धारित क्षमता का उत्पादन प्राप्त किया।

 

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