एनएलसी इंडिया का इतिहास

 

तमिलनाडु का लिग्नाइट लेजेंड

कालक्रम

भारत के कोयला अभाव ग्रस्त दक्षिणी प्रदेश में कोयला परिवार के जीवाश्म ईंधन, “लिग्नाइट” के जन्म के पीछे भरसक प्रयासों का लंबा इतिहास है। एनएलसी इंडिया लिमिटेड निगमित निकाय के रूप में स्थापित होने से पहले तमिलनाडु में घटित घटनाओं का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रस्तुत है।

 

वर्ष
घटनाओं का क्रमानुविवरण
1828
 
कैलीमियर के पास कोयला परिवार का कम कैलोरिफिक ईंधन “पीट” के पाए जाने की सूचना तंजाऊर के उप-जिलाधिकारी श्री नेल्सन द्वारा तत्कालीन मद्रास सरकार को दी गई।
1830
 
जनरल कलेन ने केन्ननोर के पास समंदर के किनारे खड़ी चट्टानों के नीचे, बाद में क्विलान के पास वरकला के पास और केरल में वैकोम के पास लिग्नाइट भंडारों को खोज निकाला।
1840
 
कैप्टन न्यूबोल्ड ने बेपोर के पास नदी के किनारे पर लेटराइट के खड़ी चट्टानों के नीचे लिग्नाइट को खोज निकाला।
1870
नीलगिरियों में सड़ा-गला घास-पात से भरा दलदल पाया गया (पीट को कीचड़ के रूप में संचयन के द्वारा वानस्पतिक पदार्थ से कोयला बनने का प्रथम चरण माना जाता है)
1877
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के श्री डब्ल्यू.किंग ने पांडिचेरी के आसपास सोता कुआँ का अध्ययन शुरू किया। उनको कार्बोनेशियस स्ट्राटा मिला।
1884
श्री पोईले, एक फ्रांसीसी अभियंता को तत्कालीन फ्रांसीसी प्रदेश बाहूर के पास एक नलकूप में लिग्नाइट का सीम मिला। किनारे के साथ-साथ आगे के अन्वेषणों ने कडलूर के पास उदरमाणिक्कम, अरंगनूर और कन्नैरकोइल के पास लिग्नाइट भंडार होने की संभावना की ओर आगाह किया। कासरगड के पास लिग्नाइट भंडार स्थित पाए गए और दक्षिण केनरा के जिलाधिकारी ने राजस्व मंडल को इसकी सूचना दी।
1934
तत्कालीन मद्रास सरकार के उद्योग विभाग ने नेयवेली के पड़ोस में सोता कुआँ के जल का संचयन करने नलकूप खोदा। पाए गए लिग्नाइट परमाणुओं को ड्रिलिंग में नियुक्त अनपढ़ लोगों ने “काला-मृदा” समझा।
1935
 
नेयवेली में जंबुलिंग मुदलियार की भूमि में नलकूप खुदवाए गए और उनसे निकले काला पदार्थ नेयवेली वृद्धाचलम प्रदेश में किसी दूसरे मिशन पर नियुक्त कैंपिंग भू-वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट किया।
1937-38
उपर्युक्त नलकूप से निकला काला पदार्थ के नमूने का विश्लेषण के लिए मद्रास सरकार को भेजा गया।
1941
 
मेसर्स.बिन्नी & कंपनी, मद्रास ने नेयवेली के पास अजीज नगर में चार या पाँच नलकूपों को खोदा, जिनमें से दो में लिग्नाइट भंडार होने का प्रमाण पाया गया। लेकिन, केसिंग पाइपों और ड्रिलिंग उपकरणों के अभाव में आगे के काम को छोड़ दिया गया।
1943-46
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने नेयवेली के पास ड्रिलिंग प्रचालन शुरु किए। प्राथमिक जाँच से पता चला कि उस प्रदेश में लगभग 500 टन लिग्नाइट विद्यमान है।
1947
भारत सरकार द्वारा प्रतिनियुक्त भू-वैज्ञानिक और खनन अभियंता, श्री एच.के.घोष का नेयवेली आगमन और उनके प्रचालनों की शुरुआत
1948
 
Tपानी पडने और रेत की परतों की वजह से श्री घोष द्वारा खुदवाए गए प्रथम नलकूपों को छोड़ देना पड़ा। सितंबर 1951 में तीसरे नलकूप से लिग्नाइट के नमूने निकले।
1949
 
श्री घोष ने प्रयोगात्मक ओपन कट योजना बनाई और उत्खनन शुरू करने के लिए निविदा आमंत्रित किया।
1951
 
चयनित प्रदेश में दूर-दूर पर 175 नलकूपों को खुदवाकर श्री घोष ने उस प्रदेश में लगभग 2000 मिलियन टनों के लिग्नाइट भंडार विद्यमान होने का निरूपण किया। राज्य सरकार के उद्योग और वाणिज्य विभाग ने भी वृद्धाचलम में दक्षिणी प्रदेश में 150 नलकूपों को खुदवाया। नेयवेली में लिग्नाइट खनन के इंजीनियरिंग और आर्थिक पहलुओं का निर्धारण करने के लिए बिंदु चार कार्यक्रम के तहत एक खनन अभियंता, श्री पॉल ऐरिच को खान ब्यूरो, अमरीका संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिनियुक्त किया। उनके सिफारिशों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र सरकार ने श्री वी.एफ.पेरी के निदेशाधीन इस विषय पर एक अध्ययन का प्रायोजन किया।
1952
 
लिग्नाइट खनन की उच्च स्तरीय आधिकारिक समिति ने प्रायोगिक क्वारी परियोजना की सिफारिश की।
1953
 
डॉ.यू.कृष्णाराव, उद्योग मंत्री, मद्रास सरकार द्वारा प्रायोगिक क्वारी परियोजना का कमीशनिंग।
1954
पंडित नेहरू का प्रायोगिक क्वारी परियोजना का संदर्शन। श्री सी.वी.नरसिंहन, आई.सी.एस., श्री ए.सी.गुहा और श्री ए.लाहिरी से युक्त भारत सरकार की समिति ने प्रायोगिक क्वारी परियोजना का निरीक्षण करके सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत की। कोलंबो योजना के तहत इस परियोजना रिपोर्ट के लिए यु.के.फर्म, पी.डी.टी.एस. (मेसर्स.पोवेल डफ्रिन टेक्निकल सर्वीसेज़ लिमिटेड) ने अपनी सेवाएँ प्रदान की।
1955
नेयवेली लिग्नाइट परियोजना के कार्य, जो अभी तक राज्य सरकार द्वारा चलाए गए, अब संपूर्ण वित्तीय दायित्व के साथ केंद्र सरकार को सौंप दिए गए। श्री टी.एम.एस.मणि, आई.सी.एस., सचिव, उद्योग, श्रम और सहयोग विभाग ने इस परियोजना के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।
1956
निगमित निकाय के रूप में एन.एल.सी. की स्थापना। सरकार द्वारा प्रायोजित वाणिज्यिक संस्था के रूप में एन.एल.सी. का जन्म हुआ है।

 

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